सन फार्मा – दिलीप शांघवी की प्रेरक कहानी Sun Pharma – Dilip Shanghvi Motivational Story

सन फार्मा – दिलीप शांघवी की प्रेरक कहानी

सन फार्मा भारत की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनी है, जो अमेरिका में सबसे बड़ी भारतीय फार्मा कंपनी और दुनिया भर में 5 वीं सबसे बड़ी जेनेरिक दवाई बनाने वाली कंपनी है। इसकी स्थापना संस्थापक श्री दिलीप शांघवी ने 1983 में उधार के मात्र ₹10000 की थी। अपने बुलंद हौसले और बड़ी सोच की वजह से आज इस कंपनी को उन्होंने इतने बड़े मुक़ाम पे लाके खड़ा कर दिया है।

दिलीप शांघवी एक भारतीय अरबपति व्यापारी हैं और देश के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। भारत सरकार ने उन्हें 2016 में पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया है। इंडिया टुडे पत्रिका ने उन्हें साल 2017 में सबसे शक्तिशाली लोगों की सूची में 8 वें स्थान पर रखा है। फोर्ब्स के अनुसार, अक्टूबर 2019 तक, दिलीप शांघवी भारत में US $ 6.9 बिलियन की कुल संपत्ति के साथ 12 वें सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

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Image Source – Google Image By business-standard

दिलीप शांघवी का प्रारंभिक जीवन

दिलीप शांघवी का जन्म गुजरात के छोटे से जिले अमरेली के एक मध्यमवर्गीय जैन परिवार में 1 अक्टूबर 1955 को हुआ था। उनके पिता शांतिलाल शांघवी कोलकाता में जेनेरिक दवाओं के होलसेल डिस्ट्रीब्यूटर थे। पढ़ने लिखने में शुरू से ही काफी होशियार दिलीप शांघवी की हाई स्कूल तक की शिक्षा जे जे अजमेरा हाई स्कूल से हुई और कोलकाता में स्थित भवानीपुर एजुकेशन सोसायटी कॉलेज से उन्होंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की।

ग्रेजुएशन के दौरान से ही वह अपने पिता को उनके होलसेल जेनेरिक दवाओं के कारोबार में मदद किया करते थे। इस काम के दौरान उन्होंने दूसरों के उत्पादों को बेचने के बजाय अपनी दवाओं के निर्माण के बारे में सोचा और ग्रेजुएशन के बाद कुछ वक्त तक वह अपने पिता के साथ काम करते रहे।

सन फार्मा की स्थापना

कुछ बड़ा करने की इरादे से 1982 में दिलीप शांघवीने अपने पिता से ₹10000 उधार लिए और मुंबई आ गए। यहां पर केवल दो लोगों की मार्केटिंग टीम के साथ उन्होंने पांच मनोचिकित्सक की दवाइयों के साथ साल 1983 में वापी गुजरात से सन फार्मा की शुरुआत की।

पहले साल उनकी कंपनी की सेल लगभग 7000000 रुपय हुई। उसके बाद उन्होंने कुछ और पैसे उधार लिए और गुजरात के वापी में सन फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज के नाम से पांच एंप्लाइज के साथ अपनी पहली छोटी सी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई। उनकी सप्लाई शुरुआत में कुछ ही शहरों तक सीमित थी, लेकिन शांघवी और उनकी टीम ने दिन-रात कड़ी मेहनत की और महज 4 साल के भीतर उनके उत्पाद पूरे देश भर में बिकने लगे।

यह वह दौर था जब इंडियन फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में ज्यादातर पेटेंट और अधिक मार्जिन वाली मेडिसिंस पर मल्टीनेशनल या फिर सिप्ला और रैनबैक्सी जैसी कंपनियों का एकाधिकार था। उस समय दिलीप शांघवी कम प्रतिस्पर्धा और बिना पेटेंट वाली जेनेरिक दवाओं में अपना पोर्टफोलियो धीरे-धीरे बढ़ाते जा रहे थे। ऐसे प्रोडक्ट थे जो उनके प्रतिद्वंद्वियों की प्राथमिकता में नहीं आते थे। उन्होंने ब्रांड्स, प्राइसिंग स्ट्रेटजी और सेल्स एंड डिसटीब्यूशन नेटवर्क पर ज्यादा ध्यान दिया।जिसकी वजह से उनकी कंपनी कुछ ही सालों में कई गुना बड़ी हो गई।

सन फार्मा का तेजी से विस्तार

साल 1989 में दिलीप शांघवी ने पड़ोसी देशों में दवाओं का निर्यात करना शुरू कर दिया जो उनकी तरक्की में एक मील का पत्थर साबित हुआ। 1991 में उन्होंने अपनी कंपनी के लिए एक रिसर्च सेंटर की स्थापना की। साल 1994 में उन्होंने शेयर बाजार में अपनी कंपनी का पब्लिक इशू निकाला, जो 55 गुना ओवरसब्सक्राइब हुआ था। दिलीप शांघवी की सफलता में घाटे में चलती हुई कंपनियों के अधिग्रहण का एक बहुत बड़ा रोल रहा है।

1996 से लेकर आज तक उन्होंने देशी और विदेशी मिलाकर लगभग 19 ज्यादा कंपनियों का अधिग्रहण किया। जिनमें से अधिकतर कंपनियां घाटे में चल रही थी। उन्होंने उन कंपनियों का नवीनीकरण कर घाटे को प्रॉफिट में बदला और आज उनकी आय का एक बहुत ही बड़ा हिस्सा उन्हीं कंपनियों से आता है। यह दिलीप शांघवी की लीडरशिप का ही कमाल है कि लगभग 33-34 साल पहले शुरू की हुई सन फार्मा आज देश के सबसे बड़ी फार्मा कंपनी बन गई है।

कंपनियों का अधिग्रहण

पिछले कुछ सालों में सन फार्माने कारको फार्मास्यूटिकल लैबोरेट्रीज, टेराफॉर्म और रैनबैक्सी जैसे  कंपनियों का अधिग्रहण किया है जिसकी वजह से आज यह कंपनी फार्मा सेक्टर के शीर्ष पर पहुंच गई है। साल 2014 में 25237 करोड़ में रैनबैक्सी के अधिग्रहण ने दिलीप शांघवी को इंडिया के फार्मा सेक्टर का किंग बना दिया है। आज उनका सेल्स नेटवर्क लगभग 24 से ज्यादा देशों में फैला हुआ है। उनकी कंपनी आज जेनेरिक दवाएं बनाने वाली भारत की नंबर वन और विश्व की पांचवें नंबर की कंपनी बन गई है।

कंपनी की बढ़त का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि यदि 1994 में किसी व्यक्ति ने उनकी कंपनी में केवल ₹10000 के शेयर खरीदे थे तो आज उनकी कीमत ₹5000000 है। जिसमें डिविडेंड शामिल नहीं है। फार्मा सेक्टर की दूसरे नंबर की कंपनी डॉक्टर रेडीज वैल्यूएशन के लिहाज से सनफार्मा से लगभग 3 गुना पीछे है।

दिलीप शांघवी जी की इस कहानी से पता चलता है कि, कैसे एक मध्यमवर्गीय परिवार के एक व्यक्ति ने केवल ₹10000 से एक लाख करोड़ से भी ऊपर का साम्राज्य बना डाला। जिनके पास ना तो मुकेश अंबानी की तरह उनके पिता की कोई संपत्ति थी और ना ही खुद के पास कोई खास पूंजी। बस पास में था तो एक लक्ष्य और एक दृढ़ संकल्प। अंत में इतना ही, हर सपने को अपनी सांसों में रखो हर मंजिल को अपनी बाहों में रखो, हर जीत आपकी है ए दोस्त, बस अपने लक्ष्य को अपनी निगाहों में रखो।

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